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Friday, May 14, 2010

राष्ट्र का प्राण है गाय


सीकर। पौष माह की गोधूली बेला और गो भक्तों का लगता रैला। कहीं कलश यात्रा तो कहीं वाहन रैली। जगह-जगह स्वागत द्वारों और केसरिया ध्वजों के रंग में रंगा शहर का चप्पा-चप्पा। पुष्पों की पंखुडियों से महकती राहें और गो माता की जयकार से गूंजता आसमान। कुछ ऎसे ही नजारे शुक्रवार को दिखाई दिए शेखावाटी अंचल के सीकर, फतेहपुर और रतगनढ़ कस्बे में।अंचलवासियों ने विश्व मंगल गो ग्राम की मुख्य यात्रा के स्वागत में पलक पांवड़े बिछा दिए। लोगों का उत्साह और जोश इस तरह उमड़ा कि सीकर का रामलीला मैदान और फतेहपुर की बुधगिरी मढ़ी का वातावरण गोकुलमय हो गया। गाय की वंदना और अर्चना के लिए अंचलवासी उमड़ पड़े और पुष्प वर्षा कर अपनी भावनाओं का इजहार किया। इसके बाद हर दिल से एक पुकार उठी ... गाय बचेगी तो देश बचेगा। चलें गाय की ओर... चलें गांव की ओर ... चलें प्रकृति की ओर... सरीखे स्लोगन की सार्थकता शुक्रवार को सजीवता से नजर आई।
राष्ट्रीय प्राणी घोषित करने की मांग
फतेहपुर में बुधगिरी मढ़ी और सीकर शहर में रामलीला मैदान में आयोजित विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के मुख्य समारोहों को संबोधित करते हुए कर्नाटक की गोकर्ण पीठ के जगद्गुरूशंकराचार्य राघवेश्वर भारती ने अंचलवासियों से गो रक्षा के लिए आगे आने, उसका पालन और संरक्षण करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हमारी तीन माताएं हैं। जन्म देने वाली माता, धरती माता व गो माता। जन्म देने वाली माता हमारा लालन पालन करती है। उसका पालन धरती माता करती है और धरती माता का लालन पालन व उसकी उवर्रक क्षमता गो माता बढ़ाती है। इस त्रिकोण की रक्षा व देश को टूटने से बचाने के लिए गो माता की रक्षा करनी होगी। राघेश्वर भारती ने कहा कि शंकराचार्य पद पर भिक्षु हैं। भिक्षु बनकर आन्दोलन के लिए आपसे आपको मांगने आए हैं। उन्होंने कहा कि जीवन हो गाय के लिए व मृत्यु हो गाय के लिए। यहीं भिक्षा आपसे मांगने आए हैं।यह ऎच्छिक नहीं हमारा कर्तव्य है। अपने माता-पिता व गुरूके प्रति कर्तव्य है उसी तरह गो माता के प्रति हमारा कर्तव्य है। विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के राष्ट्रीय सचिव शंकरलाल ने कहा कि देश को गाय के माध्यम से प्रदूषण व रोग मुक्त तथा स्वावलम्बी बनाना होगा। आज गाय की दुर्दशा के कारण जल, जमीन और जीवन नष्ट हो रहा है। अब लोगों को गाय के गोबर घी, दूध, दही व गोमूत्र की आर्थिक महत्ता समझ में आने लगी है। दूध, घी व दही से रोगों को दूर किया जाने लगा है। देश में बढ़ते अपराध का मुख्य कारण भी गो माता की उपेक्षा है। सन 1947 में देश में करीब 43 करोड़ गोधन था, जो आज महज 10 करोड़ रह गया है। देश में प्रतिदिन करीब एक लाख व एक वर्ष में तीन करोड़ गायों को काटा जा रहा है। इसलिए देश को बचाने के लिए गायों को बचाना होगा। सीकर में समारोह से पहले महिलाओं ने कलश यात्रा निकाली। उसके बाद यात्रा के आगमन पर उसे वाहन रैली के साथ शहर के प्रमुख मार्गो से होते हुए यात्रा को रामलीला मैदान लाया गया। यहां शंकराचार्य ने गो माता की पूजा कर समारोह का शुभारंभ किया। सीकर शहर में आयोजित समारोह के अंत में रैवासा पीठाधीश्वर राघवाचार्य महाराज ने उपस्थित सभी लोगों को गो रक्षा का संकल्प दिलाया। सभी समस्याओं का मूल गो हत्या है और सभी तरह की शुद्धि का मूल गो रक्षा है। गाय एक प्राणी नहीं बल्कि यह राष्ट्र का प्राण है। राष्ट्र प्राण को राष्ट्रीय प्राणी घोषित करना ही चाहिए। आज देश में गाय को राष्ट्रीय प्राणी घोषित नहीं कर हम जीवन की जड़ों को काट रहे हैं। गाय हमारे जीवन में उसी तरह महत्वपूर्ण है जिस तरह इमारत के लिए नींव व पेड़ के लिए जड़। -
शिखर पर पहुंचाएं
सीकर। शंकराचार्य राघवेश्वर भारती ने कहा कि शेखावाटी के बारे में सुना था। आज आंखों से देखने का मौका मिला है। सीकर वाले यात्रा को शिखर तक पहुंचाएं। इतिहास पुरूष पैदा करने वाली शेखावाटी की भूमि को नमन करता हूं। गाय बचाने के इस महासंग्राम में भी शेखावाटी का योगदान आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यात्रा में सीकर का योगदान शिखर जैसा होना चाहिए।
गो पूजा से शुभारम्भ
समारोह का शुभारम्भ कामधेनु ध्वजारोहण से किया गया। इस दौरान शंकराचार्य राघवेश्वर भारती को समिति की महिला प्रभारी कृष्णा शेखावत ने गाय की पूजा करवाई। उन्होंने गाय की पूजा कर महाआरती की। बाद में मंच पर समिति के पदाधिकारियों की ओर से उनका फूल माला पहनाकर स्वागत किया गया।वैदिक आश्रम में मंत्रणागोकर्ण पीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य राघवेश्वर भारती शुक्रवार रात को वैदिक आश्रम पिपराली पहुंचे। वहां पर उन्होंने स्वामी सुमेधानंद सरस्वती के साथ करीब आधा घंटे तक मंत्रणा की। इससे पहले स्वामी सुमेधानंद सरस्वती और आश्रम के कार्यकर्ताओं ने शंकराचार्य का भावभीना स्वागत किया। इस दौरान गाय के विषय पर विस्तार से चर्चा की गई। साथ ही वेद, संस्कृत, संस्कृति और राष्ट्रधर्म पर भी बातचीत हुई। इसके बाद शंकराचार्य नीमकाथाना के लिए प्रस्थान कर गए।
नहीं आदेश दिया
उन्होंने कहा कि हम पांच साल के अधिकारी नहीं हैं। हमें वोट नहीं चाहिए। हम कोई उद्योगपति व व्यापारी भी नहीं है। हम गो माता की प्राण रक्षा के लिए आए हैं। शेखावाटी के लोगों को आदेश देते है कि वे माता को कटने नहीं देंगे। गाय हत्या, गो तस्करी नहीं हो इसके लिए हर संभव प्रयास करेंगे। भगवान शिव की आराधनासमारोह के बाद शंकराचार्य राघवेश्वर भारती ने समुत्कर्ष भवन में संध्या आरती की। करीब एक घंटे के दौरान उन्होंने भगवान शिव की भव्य आरती की। आरती के दौरान शहर में प्रमुख लोग उपस्थित थे। संतो के अनुसार शंकराचार्य की वर्षों की परम्परा के अनुसार शाम की आरती करीब एक घंटे तक की जाती है।
अभी तक नहीं हुए संगठित प्रयास -शंकराचार्य
जगदगुरू शंकराचार्य राघवेश्वर भारती का मानना है कि गो रक्षार्थ देशभर में अभी तक संगठित प्रयास नहीं हुए हैं। हालांकि गो माता को बचाने के लिए अनेक आंदोलन और अभियान चलाए गए, लेकिन संतों ने सेना की तरह व्यूय रचना कर एक स्वर में अभियान को गति नहीं दी। विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के जरिए देश भर के संतों को जोड़ा जा रहा है। इस तरह यह अभियान पूरी तरह संगठित और एक है।
राजस्थान पत्रिका से विशेष वार्ता
विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के मुख्य यात्रा समारोह के बाद शुक्रवार रात को समुत्कर्ष भवन में शंकराचार्य ने राजस्थान पत्रिका से विशेष वार्ता में यह बात कही। प्रस्तुत से बातचीत के मुख्य अंश-पत्रिका- गाय के प्रति आदर तो है लेकिन वह घर-घर से दूर है।
शंकराचार्य- भौतिक और आर्थिक युग में लोगों की सोच बदल गई है। इस कारण गाय के प्रति लोगों में समर्पण तो है, लेकिन वह घर-घर में नहीं रखी जा रही है। हालांकि गाय से धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ मिलता है। साथ ही गाय आर्थिक संबल प्रदान करती है। इस पक्ष को मजबूत करने के लिए हम गो मूत्र और गोबर आधारित वृहद् उद्योग स्थापित कर रहे हैं।
पत्रिका- आपकी प्रमुख मांग क्या है?
शंकराचार्य- गाय के साथ अत्याचार हो रहा है। गाय भारतीय संस्कृति, धर्म और सत्यता की प्रमुख आधार स्तम्भ है। गाय रहेगी तो संस्कृति बचेगी और देश सुरक्षित रहेगा। इसलिए गाय को राष्ट्रीय प्राणी घोषित करने की मांग की जा रही है।
पत्रिका- गो रक्षा के लिए क्या सरकार के प्रयास पर्याप्त हैं।
शंकराचार्य- सरकार, नेता और राजनीति से यह आंदोलन परे है। यह आंदोलन जनता की तरफ है ना कि सरकार की तरफ। हमारा अभियान गाय के प्रति आमजन को जागरूक कर उन्हें गाय के प्रति एकजुट करने का है। यदि हम देशवासियों को इस अभियान से जोड़ने में सफल हो जाते हैं तो नेता स्वयं मजबूर हो जाएंगे।
पत्रिका- देश भर में 33 हजार से अधिक गो कत्लखाने हैं। इन कत्लखानों को बंद करने के लिए संत आमरण अनशन क्यों नहीं करते।
शंकराचार्य- इसके लिए हम आंदोलन करेंगे। हम बलिदान के लिए तैयार हैं, लेकिन बलिदान निरर्थक और व्यर्थ नहीं हो इसके लिए संगठित होकर आंदोलन करेंगे।
स्त्रोत : http://www.patrika.com/news.aspx?id=297552सीकर। पौष माह की गोधूली बेला और गो भक्तों का लगता रैला। कहीं कलश यात्रा तो कहीं वाहन रैली। जगह-जगह स्वागत द्वारों और केसरिया ध्वजों के रंग में रंगा शहर का चप्पा-चप्पा। पुष्पों की पंखुडियों से महकती राहें और गो माता की जयकार से गूंजता आसमान। कुछ ऎसे ही नजारे शुक्रवार को दिखाई दिए शेखावाटी अंचल के सीकर, फतेहपुर और रतगनढ़ कस्बे में।अंचलवासियों ने विश्व मंगल गो ग्राम की मुख्य यात्रा के स्वागत में पलक पांवड़े बिछा दिए। लोगों का उत्साह और जोश इस तरह उमड़ा कि सीकर का रामलीला मैदान और फतेहपुर की बुधगिरी मढ़ी का वातावरण गोकुलमय हो गया। गाय की वंदना और अर्चना के लिए अंचलवासी उमड़ पड़े और पुष्प वर्षा कर अपनी भावनाओं का इजहार किया। इसके बाद हर दिल से एक पुकार उठी ... गाय बचेगी तो देश बचेगा। चलें गाय की ओर... चलें गांव की ओर ... चलें प्रकृति की ओर... सरीखे स्लोगन की सार्थकता शुक्रवार को सजीवता से नजर आई।
राष्ट्रीय प्राणी घोषित करने की मांग
फतेहपुर में बुधगिरी मढ़ी और सीकर शहर में रामलीला मैदान में आयोजित विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के मुख्य समारोहों को संबोधित करते हुए कर्नाटक की गोकर्ण पीठ के जगद्गुरूशंकराचार्य राघवेश्वर भारती ने अंचलवासियों से गो रक्षा के लिए आगे आने, उसका पालन और संरक्षण करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हमारी तीन माताएं हैं। जन्म देने वाली माता, धरती माता व गो माता। जन्म देने वाली माता हमारा लालन पालन करती है। उसका पालन धरती माता करती है और धरती माता का लालन पालन व उसकी उवर्रक क्षमता गो माता बढ़ाती है। इस त्रिकोण की रक्षा व देश को टूटने से बचाने के लिए गो माता की रक्षा करनी होगी। राघेश्वर भारती ने कहा कि शंकराचार्य पद पर भिक्षु हैं। भिक्षु बनकर आन्दोलन के लिए आपसे आपको मांगने आए हैं। उन्होंने कहा कि जीवन हो गाय के लिए व मृत्यु हो गाय के लिए। यहीं भिक्षा आपसे मांगने आए हैं।यह ऎच्छिक नहीं हमारा कर्तव्य है। अपने माता-पिता व गुरूके प्रति कर्तव्य है उसी तरह गो माता के प्रति हमारा कर्तव्य है। विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के राष्ट्रीय सचिव शंकरलाल ने कहा कि देश को गाय के माध्यम से प्रदूषण व रोग मुक्त तथा स्वावलम्बी बनाना होगा। आज गाय की दुर्दशा के कारण जल, जमीन और जीवन नष्ट हो रहा है। अब लोगों को गाय के गोबर घी, दूध, दही व गोमूत्र की आर्थिक महत्ता समझ में आने लगी है। दूध, घी व दही से रोगों को दूर किया जाने लगा है। देश में बढ़ते अपराध का मुख्य कारण भी गो माता की उपेक्षा है। सन 1947 में देश में करीब 43 करोड़ गोधन था, जो आज महज 10 करोड़ रह गया है। देश में प्रतिदिन करीब एक लाख व एक वर्ष में तीन करोड़ गायों को काटा जा रहा है। इसलिए देश को बचाने के लिए गायों को बचाना होगा। सीकर में समारोह से पहले महिलाओं ने कलश यात्रा निकाली। उसके बाद यात्रा के आगमन पर उसे वाहन रैली के साथ शहर के प्रमुख मार्गो से होते हुए यात्रा को रामलीला मैदान लाया गया। यहां शंकराचार्य ने गो माता की पूजा कर समारोह का शुभारंभ किया। सीकर शहर में आयोजित समारोह के अंत में रैवासा पीठाधीश्वर राघवाचार्य महाराज ने उपस्थित सभी लोगों को गो रक्षा का संकल्प दिलाया। सभी समस्याओं का मूल गो हत्या है और सभी तरह की शुद्धि का मूल गो रक्षा है। गाय एक प्राणी नहीं बल्कि यह राष्ट्र का प्राण है। राष्ट्र प्राण को राष्ट्रीय प्राणी घोषित करना ही चाहिए। आज देश में गाय को राष्ट्रीय प्राणी घोषित नहीं कर हम जीवन की जड़ों को काट रहे हैं। गाय हमारे जीवन में उसी तरह महत्वपूर्ण है जिस तरह इमारत के लिए नींव व पेड़ के लिए जड़। -
शिखर पर पहुंचाएं
सीकर। शंकराचार्य राघवेश्वर भारती ने कहा कि शेखावाटी के बारे में सुना था। आज आंखों से देखने का मौका मिला है। सीकर वाले यात्रा को शिखर तक पहुंचाएं। इतिहास पुरूष पैदा करने वाली शेखावाटी की भूमि को नमन करता हूं। गाय बचाने के इस महासंग्राम में भी शेखावाटी का योगदान आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यात्रा में सीकर का योगदान शिखर जैसा होना चाहिए।
गो पूजा से शुभारम्भ
समारोह का शुभारम्भ कामधेनु ध्वजारोहण से किया गया। इस दौरान शंकराचार्य राघवेश्वर भारती को समिति की महिला प्रभारी कृष्णा शेखावत ने गाय की पूजा करवाई। उन्होंने गाय की पूजा कर महाआरती की। बाद में मंच पर समिति के पदाधिकारियों की ओर से उनका फूल माला पहनाकर स्वागत किया गया।वैदिक आश्रम में मंत्रणागोकर्ण पीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य राघवेश्वर भारती शुक्रवार रात को वैदिक आश्रम पिपराली पहुंचे। वहां पर उन्होंने स्वामी सुमेधानंद सरस्वती के साथ करीब आधा घंटे तक मंत्रणा की। इससे पहले स्वामी सुमेधानंद सरस्वती और आश्रम के कार्यकर्ताओं ने शंकराचार्य का भावभीना स्वागत किया। इस दौरान गाय के विषय पर विस्तार से चर्चा की गई। साथ ही वेद, संस्कृत, संस्कृति और राष्ट्रधर्म पर भी बातचीत हुई। इसके बाद शंकराचार्य नीमकाथाना के लिए प्रस्थान कर गए।
नहीं आदेश दिया
उन्होंने कहा कि हम पांच साल के अधिकारी नहीं हैं। हमें वोट नहीं चाहिए। हम कोई उद्योगपति व व्यापारी भी नहीं है। हम गो माता की प्राण रक्षा के लिए आए हैं। शेखावाटी के लोगों को आदेश देते है कि वे माता को कटने नहीं देंगे। गाय हत्या, गो तस्करी नहीं हो इसके लिए हर संभव प्रयास करेंगे। भगवान शिव की आराधनासमारोह के बाद शंकराचार्य राघवेश्वर भारती ने समुत्कर्ष भवन में संध्या आरती की। करीब एक घंटे के दौरान उन्होंने भगवान शिव की भव्य आरती की। आरती के दौरान शहर में प्रमुख लोग उपस्थित थे। संतो के अनुसार शंकराचार्य की वर्षों की परम्परा के अनुसार शाम की आरती करीब एक घंटे तक की जाती है।
अभी तक नहीं हुए संगठित प्रयास -शंकराचार्य
जगदगुरू शंकराचार्य राघवेश्वर भारती का मानना है कि गो रक्षार्थ देशभर में अभी तक संगठित प्रयास नहीं हुए हैं। हालांकि गो माता को बचाने के लिए अनेक आंदोलन और अभियान चलाए गए, लेकिन संतों ने सेना की तरह व्यूय रचना कर एक स्वर में अभियान को गति नहीं दी। विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के जरिए देश भर के संतों को जोड़ा जा रहा है। इस तरह यह अभियान पूरी तरह संगठित और एक है।
राजस्थान पत्रिका से विशेष वार्ता
विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के मुख्य यात्रा समारोह के बाद शुक्रवार रात को समुत्कर्ष भवन में शंकराचार्य ने राजस्थान पत्रिका से विशेष वार्ता में यह बात कही। प्रस्तुत से बातचीत के मुख्य अंश-पत्रिका- गाय के प्रति आदर तो है लेकिन वह घर-घर से दूर है।
शंकराचार्य- भौतिक और आर्थिक युग में लोगों की सोच बदल गई है। इस कारण गाय के प्रति लोगों में समर्पण तो है, लेकिन वह घर-घर में नहीं रखी जा रही है। हालांकि गाय से धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ मिलता है। साथ ही गाय आर्थिक संबल प्रदान करती है। इस पक्ष को मजबूत करने के लिए हम गो मूत्र और गोबर आधारित वृहद् उद्योग स्थापित कर रहे हैं।
पत्रिका- आपकी प्रमुख मांग क्या है?
शंकराचार्य- गाय के साथ अत्याचार हो रहा है। गाय भारतीय संस्कृति, धर्म और सत्यता की प्रमुख आधार स्तम्भ है। गाय रहेगी तो संस्कृति बचेगी और देश सुरक्षित रहेगा। इसलिए गाय को राष्ट्रीय प्राणी घोषित करने की मांग की जा रही है।
पत्रिका- गो रक्षा के लिए क्या सरकार के प्रयास पर्याप्त हैं।
शंकराचार्य- सरकार, नेता और राजनीति से यह आंदोलन परे है। यह आंदोलन जनता की तरफ है ना कि सरकार की तरफ। हमारा अभियान गाय के प्रति आमजन को जागरूक कर उन्हें गाय के प्रति एकजुट करने का है। यदि हम देशवासियों को इस अभियान से जोड़ने में सफल हो जाते हैं तो नेता स्वयं मजबूर हो जाएंगे।
पत्रिका- देश भर में 33 हजार से अधिक गो कत्लखाने हैं। इन कत्लखानों को बंद करने के लिए संत आमरण अनशन क्यों नहीं करते।
शंकराचार्य- इसके लिए हम आंदोलन करेंगे। हम बलिदान के लिए तैयार हैं, लेकिन बलिदान निरर्थक और व्यर्थ नहीं हो इसके लिए संगठित होकर आंदोलन करेंगे।

जंगली पशुओं की हत्या पर प्रतिबंधप तो गाय पर क्यों नहीं



गौ हत्या प्रतिबंध के लिए गरजे संत

संजय स्वदेश
 
नागपुर। कुरुक्षेत्र (हरियाण)से निकली विश्वमंगल गो ग्राम यात्रा देशभर में 108 दिनों में करीब 25 हजार किलोमीटर की यात्रा पूरी कर नागपुर पहुंची। नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित एक भव्य समारोह में समापन हुआ। यात्रा 30 सितंबर से स्वामी राघेश्वर भारती के नेतृत्व में निकली थी। रेशिमबाग पर हजारों लोग उपस्थित हुए। गाय के प्रति श्रद्धा दिखाई। प्रदर्शनी परिसर दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था। मंच पर आए दिग्गज संतों ने एक सुर में देश में गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाने की बात कही। उन्होंने उपस्थित लोगों से सकाहारी होने का आह्वान किया। 

भाई चारे से रूकेगी गौ-हत्या : मोहन भागवत
समारोह में समरोह में उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि पहले जब गाय की बात होती थी, तो लोग इसे पिछड़ी हुई बात मानते थे। लेकिन विश्वमंगल गो-ग्राम यात्रा से लगता है कि आज गाय पर चर्चा गौरव की बात है। समाज में गौ-हत्या आपसी भाई चारे से रूकेगी। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता सुख और समानता से आती है। यह बंधुता पैदा करने वाला ग्राम है। ग्राम जीवन का नेतृत्व विकेंद्रीकृत रहता है। यह जीवन प्रदूषण से मुक्त रहता है। क्योकि ग्रामीण जीवन प्रकृति का मित्र होता है। इसलिए गांव में मनुष्य मनुष्य को पहचानता है। इसलिए यहां समानता बढ़ती है। उन्होंने कहा कि गौ-हत्या से प्रकृति को हानी है। इसलिए प्रकृति का नुकसान को रोकना जरूरी है। भागवत ने कहा कि सन् 1707 से पहले भारतीय समाज धनधान्य से संपन्न था। भारत से ही दुनियाभर में धान की 5 हजार प्रजातियां गईं। 

जंगली पशुओं की हत्या पर प्रतिबंधप तो गाय पर क्यों नहीं : रामदेव बाबा
योग गुरु बाबा रामदेव ने कहा कि देश में विदेशी आक्रमणकारी आए। सोना-चांदी लूट कर ले गए। लेकिन गाय की हत्या नहीं की। पर आज अजाद भारत की सरकार गो हत्या को लेकर चुप है। सरकार ने कई जंगली पशुओं के हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया है। फिर गाय की हत्या पर प्रतिबंध क्यों नहीं लग रहा है। उन्होंने कहा कि गाय के मांस के व्यापार से पर्यावरण को भी भारी नुकसान हो रहा है। गाय के मांस को खुले में एक जगह से दूसरे जगह नहीं रखा जा सकता है। इसे रेफिजरेटर में रख कर कई दिनों तक उपयोग किया जाता है। रेफिजरेटर से उत्सर्जित होने वाला गैस पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदायी है। उन्होंने आमजनमानस से अहिंसा परमोधरम: का अह्वान करते हुए शकाहारी होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि गो वंश का आर्थिक पक्ष बेहद महत्वपूर्ण है। 

समाज की सारी कहावतें भौंस पर : राघेश्वर भारती
स्वामी राघेश्वर भारती ने कहा कि पशुओं में गाय भी दूध और गोबर देती है, लेकिन उसके दूध और गोबर का उतना महत्व नहीं है जितना कि गाय का है। दिगंबर जैन साधु गाय के कंडे से बने भोजन को ही ग्रहण करते हैं। क्योंकि गाय का गोबर शुद्ध होता है। भैंस के गोबर में दूसरे जीवन जन्म ले लेते हैं। उन्होंने कहा कि समाज में जितनी भी कहावते हैं, वह सब भैंस के उपर है। गाय समाज में श्रद्धा का प्रतीक रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय की विशेष महत्व रहा है। समाज में यह विश्वास रहा है कि जिस घर में गांव रंभाती हैं, उस घर का गौरव बढ़ता है। उन्होंने कहा कि आज गाय सड़कों पर कचरा खाकर जी रही है। कचरे के साथ वह प्लास्टिक की थैलियां भी खाती है। लेकिन प्लास्टिक में यह कचरा कौन फेकता है। उन्होंने कहा कि रसोई संभालने वाली माताएं रसोई के कचरे को प्लास्टिक में जमा कर घर से बाहर फेंकती है। उसी कचरे को खाने के लिए गाय प्लास्टि की थैली खा जाती है। गोकर्ण पीठ के शकराचार्य विद्याभारती ने कहा कि में अनेक समस्याएं हैं। लोग समाधान खो चुके हैं। गोपालन से हर विषय में समाधान पाई जा सकती है। खेती के लिए जैविक खाद, गाय और बैलों का उपयोग होना चाहिए। 

Thursday, July 24, 2008

गाय हमारी माता है

देविंदर शर्मा

हिमालय क्षेत्र के गुज्जर व बकरवाल समुदायों के लिए भेड़ की स्थानीय जाति का खत्म हो जाना बड़ा नुकसान है. ऊन व मांस का उत्पादन बढ़ाने के मकसद से ऑस्ट्रेलिया की मैरीनो जैसी आकर्षक नस्लों के आयात के कारण पारंपरिक भेड़ें तेजी से लुप्त हुई हैं. जबकि घरेलू नस्ल पहाड़ी वातावरण के अधिक अनुकूल थीं. विदेशों से पशुधन आयात की शुरुआत के लगभग 40 साल बाद यह बात समझ में आ रही है कि यह कवायद सही नहीं थी.

श्रीनगर स्थित ट्राइबल रिसर्च एंड कल्चरल फाउंडेशन के मुताबिक आकर्षक नजर आने वाली नस्लें अपेक्षित परिणाम देने में नाकाम रहीं क्योंकि बेरहम मौसम की मार और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को झेलने में यह सक्षम नहीं थीं. इसके बावजूद, 12 पारंपरिक नस्लों की भेड़ और बकरियां लुप्तप्राय हो चुकी हैं, और अन्य कगार पर हैं.

एक ऐसे देश में मवेशियों की घरेलू नस्ल के प्रति सम्मान का पूरी तरह खत्म हो जाना समझ से परे और अक्षम्य है, जो इस तथ्य पर गर्व करता रहा हो कि वह दुनिया में सबसे अधिक, 81000 पशु जातियों के साथ तीसरा सबसे बड़ा विशाल-विविधता वाला क्षेत्र है.

हम मानते हैं कि हमारा कोई भी पशु जैनेटिक संसाधन उपजाऊ व असरदार नहीं है और उनकी उपेक्षा करते रहते हैं. हम लगातार आकर्षक नस्लों को आयात करने में लगे रहते हैं, चाहे वह भेड़ हो या बकरी, गाय, खरगोश, घोड़ा, ऊंट और खच्चर तक भी.

हालांकि गाय रूपी संपदा हमारे पास उपलब्ध है जिसे हम पवित्र और मां का दर्जा देते हैं, मगर इस मामले में भी स्थिति शर्मनाक है. सिर्फ पूजा करने के समय ही हमें पवित्र गाय की याद आती है, वर्ना तो हम इसे एक फालतू जानवर ही समझते हैं.

हमारा विश्वास है कि इसकी उत्पादकता इतनी कम है कि यह सिर्फ 250 से 500 ग्राम ही दूध दे सकती है. इसलिए दूध की उत्पादकता बढ़ाने का हमारे लिए श्रेष्ठ तरीका यही है कि विदेशी होल्सटीन फ्रीजियन या जर्सी नस्ल के साथ घरेलू नस्ल का क्रॉस करा दिया जाए. पचास साल से हम ऐसा कर रहे हैं.

हमारे देश में मवेशियों की 27 शानदार नस्लें मौजूद हैं. वह सभी इतनी अनुत्पादक, इतनी अनुपयोगी कैसे बन गईं? दुनिया में सबसे छोटी वाइचूर जैसी नस्ल, जिसे प्रतिदिन सिर्फ दो किलो चारे की जरूरत होती है, हमारी धरती से खासतौर पर गायब हो गई है. विडंबना है कि यह नस्ल इंग्लैंड की रीडिंग यूनिवर्सिटी में मौजूद है.

भारत में मवेशियों की तादाद दुनिया में सर्वाधिक, लगभग तीन करोड़ है. 27 में से हमारी आधी नस्लें लुप्त हो चुकी हैं. क्रॉस-ब्रीडिंग की अधिकता की वजह से हमारी लगभग 80 फीसदी गायें नस्ल की पहचान खो चुकी हैं. दूध के मामले में प्रतिवर्ष आठ करोड़ टन से अधिक उत्पादन के साथ दुनिया में हम अव्वल हैं. अमेरिका का स्थान दूसरा है. आधिकारिक रूप से इसका श्रेय उच्च दूध उत्पादक नस्लों के आयात और घरेलू नस्ल के साथ उनकी क्रॉस-ब्रीडिंग को दिया जाता है.

मगर क्या ये सच है कि हमारी गायों की दूध उत्पादकता बहुत कम है? क्या यह नस्लें पूरी तरह से अनुपयोगी हो चुकी हैं? राजस्थान की थारपारकर नस्ल का उदाहरण लीजिए. इसका नाम ही थार,पार,कर है, अर्थात यह थार को पार कर सकती है. जर्सी या होल्सटीन फ्रीजियन नस्ल की गाय को एक किलोमीटर चलाने की कोशिश कीजिए, आपको हकीकत पता चल जाएगी.

कुछ माह पहले एफएओ के एक अध्ययन में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि ब्राजील भारतीय नस्लों की गाय के निर्यात में सबसे आगे है. क्या कहीं कुछ गलत नहीं हो रहा है? ब्राजील हमारे यहां की नस्लों के संवर्धन में हमसे भी आगे है. 1960 के दशक की शुरुआत में ब्राजील ने भारत की छह नस्लें मंगाई थीं.

दरअसल भारतीय नस्ल के मवेशी जब ब्राजील पहुंचे तब पता चला कि यह दूध देने में भी आगे हैं. आज छह में से तीन नस्लें- गुजरात की गिर और आंध्रप्रदेश तथा तमिलनाडू की कांकरेज व ओंगोल वहां होल्सटीन फ्रीजियन व जर्सी के बराबर दूध दे रही हैं. अगर कल को ब्राजील से भारत में गायों का आयात होने लगे तो कोई हैरत नहीं होगी.

अगर हम सही ध्यान देते तो हमारी गाय सड़कों पर भटकने वाला आवारा पशु नहीं मानी जाती बल्कि एक उच्च दूध उत्पादक सम्मानीय मवेशी होती. मेरे विचार से साइंस के कारण जो गड़बड़ियां देश में हुई हैं, उनमें यह सबसे बड़ी है. अब वक्त आ चुका है कि पारंपरिक नस्ल वाले अपने पशुधन की कीमत हम पहचानें और न सिर्फ इनके संरक्षण बल्कि आर्थिक प्रगति के संसाधन के रूप में इनके इस्तेमाल के लिए देशव्यापी कार्यक्रम शुरू करें.